बिहार चुनाव के बाद अदृश्य हुए PK यहां होंगे अवतरित, 21 दिसंबर को डेमोक्रेटाइजिग पॉलिटिकल लीडरशिप पर देंगे भाषण
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20-12-2025 01:13 PM
पटना: चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर आगामी 21 दिसंबर 2025 को दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के छात्रों और शिक्षकों के साथ एक विशेष संवाद करने जा रहे हैं। विश्वविद्यालय परिसर के प्रतिष्ठित सर शंकर लाल कॉन्सर्ट हॉल में आयोजित होने वाले इस सत्र का विषय "लोकतांत्रिक राजनीतिक नेतृत्व: गैर-विरासत के उम्मीदवारों के लिए अवसर और चुनौतियाँ" रखा गया है। यह कार्यक्रम दोपहर 2:00 बजे से शुरू होगा। राजनीति के लोकतंत्रीकरण पर केंद्रित चर्चा इस सत्र का मुख्य केंद्र वह युवा वर्ग है जो किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि या पारिवारिक विरासत के बिना सार्वजनिक जीवन और राजनीति में अपनी पहचान बनाना चाहता है।
पीके का संबोधन
अक्सर यह देखा जाता है कि भारतीय राजनीति में स्थापित परिवारों का दबदबा रहता है, ऐसे में प्रशांत किशोर इस बात पर प्रकाश डालेंगे कि कैसे नए और प्रतिभाशाली व्यक्ति इन चुनौतियों को पार कर सफल नेतृत्व की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। वह गैर-विरासत वाले उम्मीदवारों के सामने आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों और उनके लिए उपलब्ध अवसरों का गहन विश्लेषण करेंगे। सीधा संवाद और वैचारिक आदान-प्रदान यह कार्यक्रम केवल एकतरफा भाषण न होकर एक इंटरैक्टिव सत्र होगा। इसमें शामिल होने वाले छात्रों और शिक्षकों को सीधे प्रशांत किशोर से प्रश्न पूछने और अपने विचार साझा करने का अवसर मिलेगा। प्रशांत किशोर, जो खुद भारतीय राजनीति की नब्ज पहचानने के लिए जाने जाते हैं, अपनी विशेषज्ञता और अनुभवों के माध्यम से युवाओं को राजनीति में करियर बनाने और नेतृत्व की बारीकियों को समझने के लिए प्रेरित करेंगे।
छात्रों को देंगे संदेश
प्रवेश और पंजीकरण की प्रक्रिया दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों और संकायों के लिए यह एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण शैक्षिक अवसर है। हालांकि यह सत्र सभी के लिए खुला है, लेकिन हॉल की सीमित क्षमता को देखते हुए प्रवेश केवल निमंत्रण द्वारा ही संभव होगा। इच्छुक प्रतिभागी कार्यक्रम के लिए जारी किए गए आधिकारिक क्यूआर (QR) कोड को स्कैन कर सकते हैं या संबंधित यूआरएल (URL) पर जाकर अपना नि:शुल्क निमंत्रण पत्र सुरक्षित कर सकते हैं। भविष्य की राजनीति की दिशा यह चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब देश की राजनीति में नए चेहरों और नई सोच की मांग बढ़ रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे अकादमिक परिवेश में इस तरह की चर्चा न केवल राजनीतिक विमर्श को समृद्ध करेगी।
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