
प्रदेश में कांग्रेस 29 में से 27 सीटों पर ही चुनाव लड़ी थी। दरअसल, कांग्रेस का चुनाव प्रबंधन शुरू से ही गड़बड़ा गया था। कांग्रेस ने आइएनडीआइ गठबंधन के तहत समाजवादी पार्टी को खजुराहो सीट दी लेकिन वहां नाटकीय घटनाक्रम के बाद सपा प्रत्याशी मीरा यादव का नामांकन पत्र निरस्त हो गया था। मीरा यादव ने जानबूझकर नामांकन पत्र पर हस्ताक्षर ही नहीं किए थे। फिर इंदौर से कांग्रेस प्रत्याशी अक्षय कांति बम भी आखिरी दिन नामांकन वापस लेकर भाजपा में शामिल हो गए। कांग्रेस के कमजोर संगठन का ही नतीजा रहा कि मतदान से पहले ही कांग्रेस दो सीटों से बाहर हो गई थी। यह भी भाजपा का आक्रामक रणनीति का ही नतीजा था कि वह कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक दबाव में ले आई।
स्वतंत्रता के बाद से अब तक का यह पहला आम चुनाव है, जब कांग्रेस छिंदवाड़ा सीट भी हार गई। इससे पहले वर्ष 1977 में आपातकाल के दौरान जनता पार्टी की लहर में भी कांग्रेस यहां से चुनाव जीती थी। वर्ष 1980 के बाद से कमल नाथ यहां नौ बार सांसद रहे और पिछला चुनाव उनके बेटे नकुल नाथ ने जीता था। वर्ष 1997 के उपचुनाव में यहां से कांग्रेस प्रत्याशी कमल नाथ चुनाव हारे थे। इसके बाद यह दूसरा अवसर है, जब यहां से भाजपा जीती है। भाजपा को आदिवासियों का भी मिला साथ छह महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में जिस आदिवासी वर्ग ने पूरे मनोयोग से भाजपा का साथ नहीं दिया था, वह इस लोकसभा चुनाव में पूरी तरह भाजपा के साथ लौट आया। प्रदेश में भाजपा को मिले क्लीन स्वीप में आदिवासी वर्ग के साथ का बड़ा योगदान है। सभी छह आदिवासी सीटों पर भाजपा ने विजय पाई। जबकि 2023 के विधानसभा चुनाव में कुल 47 सीटों में भाजपा को 22, कांग्रेस को 24 और एक पर अन्य को जीत मिली थी।
लोकसभा चुनाव से पहले ही भाजपा ने मध्य प्रदेश में नेतृत्व की कमान नई पीढ़ी को सौंपते हुए डा. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया था। इससे पहले पार्टी ने संगठन में भी पीढ़ी परिवर्तन करते हुए विष्णु दत्त शर्मा को अध्यक्ष और प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद को बनाया था। इसी सत्ता-संगठन के तालमेल ने भाजपा का रिकार्ड बनाने में अहम भूमिका निभाई। इन तीनों पर ही बूथ प्रबंधन से लेकर मतदान बढ़ाने की जिम्मेदारी थी।
कांग्रेस की पराजय के पीछे संगठनात्मक कमजोरी तो थी ही, उसका मनोबल भी टूट गया था। कांग्रेस नेता कमल नाथ और सांसद नकुल नाथ के भाजपा में जाने की अटकलों ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया था। कांग्रेस ने जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया लेकिन पीढ़ी परिवर्तन का यह प्रयास भी बेकार रहा। जिन सीटों पर कांग्रेस मजबूत दिखाई पड़ रही थी, वहां भी हार गई। कांग्रेस के सुरेश पचौरी सहित तीन लाख कांग्रेस कार्यकर्ताओं के भाजपा में शामिल होने की घटना ने आग में घी का काम किया। पीएम मोदी ने किया आक्रामक प्रचार वैसे तो मध्य प्रदेश जनसंघ के जमाने से ही भाजपा का गढ़ रहा है लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आक्रामक प्रचार ने इस चुनाव में नया रिकार्ड बनवा दिया। उन्होंने आठ जनसभाएं और दो रोड-शो किए। पीएम चार चरणों में जबलपुर (रोड-शो), बालाघाट, पिपरिया (होशंगाबाद), दमोह, सागर, हरदा, भोपाल (रोड-शो), मुरैना, धार और खरगोन आए। वहीं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी मंडला, खजुराहो (कटनी), छिंदवाड़ा, इंदौर, गुना (अशोकनगर) और राजगढ़ में सभाएं कीं। इधर, राहुल गांधी ने मंडला, शहडोल, भिंड, खरगोन और रतलाम में जनसभा की। प्रियंका गांधी वाड्रा मुरैना और मल्लिकार्जुन खरगे ने सतना में चुनाव प्रचार किया लेकिन सभी जगह कांग्रेस हार गई।