हाईकोर्ट 3 महीने से ज्यादा फैसला सुरक्षित न रखें:सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- जमानत पर आदेश उसी दिन या अगले दिन दें, अपलोड तुरंत करें

Updated on 29-05-2026 01:57 PM
नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फैसले सुरक्षित रखने के मामलों में होने वाली देरी पर चिंता जताई और इससे जुड़े 13 निर्देश देशभर के सभी हाईकोर्ट को दिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी मामले का फैसला रिजर्व रखने के बाद उसे 3 महीने में सुना दिया जाए। अगर ऐसा नहीं होता है तो रजिस्ट्रार जनरल मामले को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने रखेंगे।

CJI सूर्यकांत, जस्टिस विपुल एम पंचोली और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि जमानत के मामलों पर आदेश भी उसी दिन सुनाए जाएं। अगर फैसला रिजर्व रखा जाता है, तो उसे अगले दिन जरूर सुना दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश पिला पहन और झारखंड सरकार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिए। इससे जुड़ी याचिका में कहा गया था कि हाईकोर्ट ने फैसला अपलोड नहीं किया है।

पहले उस मामले को जानें, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए

यह मामला अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के 4 दोषियों की याचिका से जुड़ा था। जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि झारखंड हाईकोर्ट में उनकी क्रिमिनल अपील 2022 से बिना किसी फैसले के पेंडिंग है। याचिका में तर्क दिया गया कि इस प्रकार की देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है, जिसमें जल्द सुनवाई का अधिकार भी शामिल है।

नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट से अपने फैसलों की टाइम लिमिट रिपोर्ट सबमिट करने का आदेश दिया था, जिसमें फैसले रिजर्व रखने की तारीखें, फैसले सुनाए जाने की तारीखें और उन्हें वेबसाइट पर अपलोड करने की तारीखें शामिल थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को 13 निर्देश दिए

  1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों, जैसे नियमित जमानत, अग्रिम जमानत आदि मामले में हाईकोर्ट को तेजी दिखानी चाहिए।
  2. जमानत याचिकाओं की सुनवाई कर आदेश उसी दिन सुनाया और अपलोड किया जाना चाहिए। यदि आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन सुनाकर वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए।
  3. जमानत या सजा स्थगन का आदेश होते ही उसकी सूचना जेल प्रशासन को तुरंत भेजी जानी चाहिए, ताकि आरोपी/दोषी को यथासंभव उसी दिन या अधिकतम अगले दिन रिहा किया जा सके, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो या जमानत की शर्तों का पालन ना रह गया हो।
  4. यदि किसी आपराधिक अपील या मृत्युदंड संदर्भ में फैसला सुरक्षित रखा गया है। अपीलकर्ता हिरासत में है, तो बेंच फैसला सुरक्षित रखने की तारीख से 7 दिनों के भीतर पक्षकारों से स्पष्टीकरण मांग सकती है। अन्य मामलों में यह अवधि अधिकतम एक माह होगी।
  5. प्रत्येक माह के आखिर में हाईकोर्ट की वेबसाइट से एक स्वचालित ई-मेल मुख्य न्यायाधीश को भेजी जाए, जिसमें उन सभी मामलों का विवरण हो जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया है। इसकी कॉपी उससे जुड़ी पीठ को भी भेजी जाए।
  6. यदि केवल फैसले का ऑपरेटिव भाग सुनाया गया हो और 15 दिनों तक विस्तृत फैसला अपलोड न हो, तो रजिस्ट्रार जनरल मामला मुख्य न्यायाधीश को बताएगा। अगले 2 दिन में संबंधित बेंच को बताया जाएगा।
  7. यदि फैसला सुरक्षित रखने के 3 महीने बाद भी फैसला नहीं सुनाया जाता, तो कोई भी पक्षकार फैसला जारी कराने के लिए आवेदन दे सकता है। ऐसे आवेदन को दो दिनों के भीतर सूचीबद्ध किया जाएगा।
  8. यदि फैसला तीन महीने + एक माह (कुल चार महीने) तक भी नहीं सुनाया जाता, तो कोई भी पक्षकार मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध कर सकता है कि मामला उस पीठ से वापस लेकर किसी अन्य पीठ को नए सिरे से सुनवाई के लिए सौंप दिया जाए।
  9. यदि ऑपरेटिव भाग सुनाए जाने के 15 दिनों बाद भी कारणयुक्त फैसला अपलोड नहीं होता, तो कोई भी पक्षकार शीघ्र फैसला देने के लिए आवेदन कर सकता है। यह आवेदन भी दो दिनों के भीतर सूचीबद्ध होगा।
  10. यदि ऑपरेटिव भाग सुनाने के एक महीने बाद भी विस्तृत फैसला नहीं आता, तो पक्षकार मुख्य न्यायाधीश से मामला दूसरी पीठ को स्थानांतरित करने का अनुरोध कर सकता है।
  11. फैसले की सर्टिफाइड कॉपी में स्पष्ट रूप से लिखा हो-i) फैसला सुरक्षित रखने की तारीख।ii) फैसला सुनाने की तारीख।iii) वेबसाइट पर अपलोड करने की तारीख।
  12. हाईकोर्ट की वेबसाइट पर केस स्टेटस में यह जानकारी दिखाई जानी चाहिए कि फैसला कब सुरक्षित रखा गया, ऑपरेटिव भाग कब सुनाया गया और विस्तृत फैसला कब अपलोड हुआ। फैसला अपलोड होने पर पक्षकारों और वकीलों को ई-मेल से सूचना दी जानी चाहिए। सभी हाई कोर्टों के रजिस्ट्रार जनरल इन दिशानिर्देशों को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखेंगे ताकि आवश्यक नियम संशोधन कर इन्हें औपचारिक रूप से लागू किया जा सके।


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