
इस बार भी नकुल नाथ उम्मीदवार थे, पर यह चुनाव कमल नाथ का ही माना जा रहा था। हार को स्वीकार भी कमल नाथ ने ही किया। इसमें हार के बाद 77 वर्षीय कमल नाथ के लिए यह सक्रिय राजनीति का आखिरी पड़ाव हो सकता है। इसी तरह 77 वर्ष के हो चुके पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का भी यह आखिरी चुनाव माना जा रहा है। दिग्विजय सिंह ने हार स्वीकार करते हुए यह दोहरा भी दिया कि वे कई कह चुके हैं और इस पर कायम रहते हुए अब कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे। हालांकि, अभी वह राज्यसभा सदस्य हैं। उनका कार्यकाल नौ अप्रैल, 2026 तक है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया के लिए भी यह आखिरी चुनाव हो सकता है। 75 वर्ष के भूरिया को पार्टी ने रतलाम सीट से लड़ाया था। सामान्य स्थितियों में प्रदेश में अब वर्ष 2028 में विधानसभा और वर्ष 2029 में लोकसभा चुनाव होना है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के कई नेताओं के लिए यह आखिरी चुनाव तय माना गया है। प्रदेश में कांग्रेस के अन्य बड़े नेता अरुण यादव, कमलेश्वर पटेल, डा. गोविंद सिंह, अजय सिंह 'राहुल' का राजनीतिक भविष्य भी पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व चुनाव परिणाम को देखते हुए निर्धारित कर सकता है। भाजपा में भी उमा भारती, प्रभात झा जैसे बड़े नेताओं की सक्रिय राजनीति में अब कोई अवसर नहीं देखा जा रहा है।
उधर, लक्ष्य के अनुसार सभी 29 सीटें जीतने वाली भाजपा के नेताओं का मान पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने बढ़ गया है। जीत के नए रिकार्ड भी बने। पिछले वर्ष दिसंबर से मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रहे डा.मोहन यादव ने प्रदेश में 150 से अधिक जनसभाएं और रोड-शो किए। प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद ने रणनीतिकार की भूमिका निभाई, उनके बूथ प्रबंधन माडल ने भाजपा को बंपर जीत दिलाने में ऐतिहासिक योगदान किया। वहीं, प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा खुद प्रत्याशी होने के साथ पूरे प्रदेश में प्रचार के लिए सक्रिय रहे। विदिशा से प्रत्याशी रहे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने क्षेत्र के अतिरिक्त पूरे प्रदेश में प्रचार किया। हर दिन दो-तीन सभाएं कीं। उनके समर्थकों ने भी बड़ी जीत दर्ज कराई है। प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए प्रभारी बनाए गए डा. महेंद्र सिंह को सह प्रभारी सतीश उपाध्याय ने भी रणनीतिकार और अच्छे समन्यवक की भूमिका निभाई।