मोदी के मंत्री का प्यार चिराग पासवान के लिए यूं ही नहीं उमड़ा, सामने आ गई अंदर की सबसे बड़ी बात
Updated on
06-09-2025 01:34 PM
पटना: दलित राजनीति को लेकर वर्तमान गठबंधन की राजनीति में NDA को बढ़त तो मिल ही रही है। यही वजह भी है कि NDA के दलित आधार वाले साथी दल थोड़े खुले-खुले रह कर विचार भी प्रकट कर रहे थे और अपनी ताकत के इजहार के जरिए सीट शेयरिंग को मुद्दा भी बना रहे थे। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि साथी दल लोजपा(आर) अपनी ही सरकार की खिंचाई कर एक विद्रोह वाला चेहरा दिखा रहे थे। कभी-कभी तो दलित आधार वाले साथी दल एक दूसरे के विरुद्ध भी खड़े हो जा रहे थे। पर चुनाव के नजदीक आते आते लोजपा(आर) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा सेक्युलर ने यू टर्न लिया और फिर कसीदे ही पढ़े जाने लगे। जानिए NDA के दलित आधार वाले साथी दलों के बदलाव की कहानी उन्हीं की जुबानी, वो भी NBT ऑनलाइन को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के जरिए।
लोजपा का उखड़ा उखड़ा चेहरा
चुनाव के प्रारंभ में केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने न केवल खुद के चुनाव लड़ने की घोषणा की बल्कि 243 सीटों पर लोजपा(आर)के लड़ने की बात कह कर चौंका दिया। फिर तो इसके बाद तो नालंदा, खगड़िया और शाहाबाद तक से आवाजें उठने लगी कि चिराग पासवान यहां से लड़े। तब राजनीतिक गलियारों में लोजपा(आर) की इस घोषणा को गंभीरता से लिया। इसके कारण भी थे, वह इसलिए कि केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान आरा के बाबू वीर कुंवर सिंह स्टेडियम, रमना मैदान से बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट के मूल मंत्र का संदेश दे चुके थे। इस नारे के पीछे चिराग पासवान के नेतृत्व की उत्कंठ इच्छा का भी बोध होता है। कह तो यह भी दिया कि यह महासभा बिहार के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखने वाला एक जन आंदोलन है। फिर चुनाव लड़ने की बात सामने आई तो चिराग पासवान ने इनकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि मेरे चुनाव लड़ने का निर्णय संसदीय बोर्ड करेगी।
NDA दबाव में आई
तब बीजेपी के प्रदेश नेतृत्व ने चिराग पासवान की इस हुंकार को हल्के में नहीं ले पाई।पत्रकारों के पूछे जाने पर प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने जरूर कहा कि वे हमारे साथी दल हैं। उनकी पार्टी अलग हैं। उनके निर्णय अलग हो सकते हैं। हर पार्टी अपने फैसले लेने को स्वतंत्र है। हालांकि तब प्रदेश अध्यक्ष जायसवाल के इस वक्तव्य से लगा कि लोजपा(आर) बीजेपी पर दबाव बना रही है, ताकि मन मुताबिक और ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी ले सके। लोजपा(आर) की तरफ से एक फॉर्मूला भी आया कि 100 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ पांच लोकसभा सीटों पर चुनाव जीता गया है। उसी को आधार बना कर टिकट विधानसभा चुनाव में भी दिए जाएं। फिर जमुई के सांसद अरुण भारती की तरफ से एक नया फॉर्मूला आया जो था कि लोजपा (रामविलास) को 43 से 137 सीटों के बीच टिकट दिया जाए।
NDA नेतृत्व को मिला हम का साथ
हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतनराम मांझी चिराग के उठाए प्रश्न पर उखड़ गए। उन्होंने तब चिराग पासवान को गुड़ खाकर गुड़म्मे से परहेज नहीं करने की नसीहत दे दी। केंद्रीय मंत्री मांझी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया। 'अपराध करवाएं राजद वाले, तोहमत लगे सरकार पर, वाह रे गठबंधन धर्म। हमारे यहां एक कहावत है, गुड़ खाते हैं, गुड़म्मे से परहेज, यह ठीक नहीं।' मांझी ने आगे कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री आवास में माफिया की खातिरदारी नहीं होती , बल्कि उन्हें ठोक दिया जाता है। लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल उठाने वालें को यह बात समझनी चाहिए।
सीटों की हिस्सेदारी पर भी उखड़े मांझी
NDA में जब सीट हिस्सेदारी को ले कर बयानबाजों में जंग छिड़ी हुई थी तब केंद्रीय मंत्री जीतराम मांझी और चिराग पासवान के बीच भी अघोषित युद्ध छिड़ा हुआ था कि NDA की बड़ा दलित पार्टी कौन? इस युद्ध का एक चेहरा तो लोकसभा चुनाव के दौरान भी दिख गया था। लेकिन लोजपा(आर) की तरफ से जब 40 प्लस का बयान आया तो मांझी ने चिराग को लेकर बयान दिया था कि, 'मजबूत लोग बोलते नहीं, कमजोर लोग दिखावा करते हैं।' उन्होंने यह भी कहा था, '10 कारों में सिर्फ नारेबाजी करने वाले होते हैं… यह सिर्फ दिखावा है, जमीनी समर्थन नहीं।'
दलित राजनीति के वर्चस्व का यू टर्न
अभी तक पानी पी पी कर चिराग पासवान को कोसने वाले केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने इसके बाद अचानक से यू टर्न ले लिया। वो लगे चिराग पासवान को दुलारने। उनके व्यवहार में चिराग पासवान के प्रति सकारात्मक बदलाव आया। जीतन राम मांझी ने अब कहा है कि ' चिराग पासवान एनडीए गठबंधन से अलग होने जैसा गलत काम नहीं करेंगे। एनडीए गठबंधन भी उनको पूरी इज्जत देगा। चिराग पासवान को जीतने की गारंटी वाली सीटें देकर उन्हें संतुष्ट कर दिया जाएगा।'
इसलिए जीतन राम मांझी को चिराग की जरूरत
आखिर जीतनराम मांझी क्यों अचानक से चिराग पासवान के प्रति विश्वास जगाने लगे। HAM के सूत्रों की मानें तो इमामगंज सहित अन्य विधानसभा में पासवान वोटरों की संख्या ज्यादा है। जीत के लिए मांझी के उम्मीदवारों को पासवान वोटरों का समर्थन मिलना जरूरी है। तभी उनके दल को राज्य स्तरीय पार्टी का दर्ज मिल सकता है। मिली जानकारी के अनुसार मांझी को 10 सीटें मिल सकती हैं। अगर HAM 8 सीटें जीत लेता है उसे राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा मिल सकता है।
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