उत्तराखंड में बढ़ी उल्लू की तस्करी, करोड़ों में कीमत:अमीर बनाने का सपना दिखाते हैं तांत्रिक, ज्योतिषी बोले- पुण्य के नाम पर ये पाप

Updated on 17-10-2025 12:38 PM

दीपावली नजदीक आते ही उत्तराखंड के जंगलों में उल्लुओं की जान फिर खतरे में पड़ गई है। मां लक्ष्मी के वाहन माने जाने वाले इन पक्षियों को लेकर अंधविश्वास और तांत्रिक मान्यताओं के कारण तस्कर सक्रिय हो जाते हैं। माना जाता है कि दीपावली पर तंत्र साधना या सिद्धि पाने के लिए उल्लू की बलि देने से धन प्राप्त होता है।

इसी अंधविश्वास के चलते हर साल दीपावली से पहले उल्लुओं के शिकार और अवैध व्यापार की घटनाएं बढ़ जाती हैं। तराई पूर्वी वन प्रभाग हल्द्वानी समेत राज्यभर में वन वभाग ने अलर्ट जारी कर दिया है। विभाग ने जंगलों में गश्त तेज कर दी है और सभी फील्ड स्टाफ की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं।

डीएफओ प्रकाश चंद्र ने बताया कि दीपावली पर प्रतिबंधित वन्यजीवों की तस्करी की आशंका अधिक होती है, इसलिए सभी वनकर्मियों को 24 घंटे की निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं। किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि दिखने पर तत्काल रिपोर्ट करने को कहा गया है।

अंधविश्वास बना उल्लुओं का दुश्मन

ज्योतिषाचार्य डॉ. नवीन चंद्र जोशी के अनुसार, उल्लू की बलि देना महापाप है। उन्होंने कहा-

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उल्लू मां लक्ष्मी का वाहन है, इसलिए उसकी हत्या से देवी कभी प्रसन्न नहीं होतीं। यह सिर्फ अंधविश्वास है, जो पुण्य के नाम पर पाप की राह दिखाता है।

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दिवाली के समय कई तांत्रिक दावा करते हैं कि उल्लू के पंख, नाखून, चोंच या आंख से तंत्र साधना करने पर धन की प्राप्ति होती है। इसी झूठे विश्वास में लोग इन पक्षियों की तस्करी का हिस्सा बन जाते हैं।

तस्करों का ‘त्योहार कारोबार’

पिछले कुछ वर्षों में दिवाली से पहले उल्लू की अवैध बिक्री का बड़ा नेटवर्क सक्रिय हो जाता है। तंत्र-मंत्र के लालच में इनकी कीमत 1 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपए तक लगाई जाती है। सबसे ज्यादा डिमांड “पांच पंजे वाले” और “ढाई किलो वजन वाले” उल्लुओं की बताई जाती है।

वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, यूपी, एमपी, राजस्थान और बंगाल से लेकर अब उत्तराखंड तक इनकी तस्करी होती है। तस्कर इन्हें जंगलों से पकड़कर तांत्रिकों और कुछ उच्चवर्गीय लोगों तक पहुंचाते हैं।

उत्तराखंड में 19 प्रजातियां, दुनिया में 225

पूरे विश्व में उल्लू की करीब 225 प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में लगभग 36 और उत्तराखंड में 19 प्रजातियां चिह्नित की गई हैं। सबसे ज्यादा अवैध व्यापार में जो प्रजातियां आती हैं, उनमें चित्तीदार उल्लू, कॉलर वाला उल्लू, ब्राउन हॉक उल्लू और एशियाई बैरड़ उल्लू शामिल हैं।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और TRAFFIC जैसी संस्थाएं उल्लुओं के संरक्षण और अवैध व्यापार पर नजर रख रही हैं। इन संस्थाओं ने भी भारत में उल्लुओं की तेजी से घटती आबादी पर चिंता जताई है।

पारिस्थितिकी तंत्र में अहम भूमिका

उल्लू न केवल सांस्कृतिक दृष्टि से बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण पक्षी है।यह खेतों में चूहों, कीड़ों और छोटे जीवों की संख्या को नियंत्रित करता है, जिससे फसलें सुरक्षित रहती हैं। इसी कारण इसे किसानों का मित्र पक्षी कहा जाता है। इसके घटने से पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है।

अब पढ़िए कानून क्या कहता है....

भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची-1 के तहत उल्लू को संरक्षित प्राणी घोषित किया गया है। इसका शिकार या व्यापार करने पर तीन साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। वन विभाग ने चेतावनी दी है कि उल्लू की तस्करी में शामिल किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

कहीं रात का शैतान को कहीं ये पक्षी रक्षक

दुनिया की कई संस्कृतियों में उल्लू को रहस्यमयी और अलौकिक पक्षी माना गया है।अफ्रीका के कई हिस्सों में इसे मौत, बीमारी और दुर्भाग्य का संकेत समझा जाता है।केन्या में मान्यता है कि यदि किसी ने उल्लू की आवाज सुन ली, तो उसकी मृत्यु निकट है।अमेरिका की मूल निवासी जनजातियां भी इसे “दैवी खतरे का वाहक” मानती रही हैं।

ढाई हजार साल पहले रोम के विद्वान प्लिनी ने उल्लू को “रात का शैतान” बताया था।उनका मानना था कि इसके अंग दर्द और बीमारियों को दूर करने में सक्षम हैं।मैक्सिको की प्राचीन टियोतिहुआकान सभ्यता में इसे बुराई का प्रतीक,जबकि यूरोप में चुड़ैलों का साथी माना गया।

हालांकि, कुछ संस्कृतियों में उल्लू को रक्षक और शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है।प्राचीन ग्रीस में यह ज्ञान और युद्ध की देवी एथेना का प्रतीक था।युद्ध के मैदान में उल्लू दिखने का अर्थ माना जाता था कि देवी एथेना स्वयं युद्ध में शामिल हैं।भारत और जापान में उल्लू को संपन्नता, बुद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।



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