
23 साल पुराने वायरलेस सेट पर पुलिस का गोपनीय संवाद चरमरा गया है। हालात ये हैं कि अफसरों के दिशा-निर्देश मातहतों तक ठीक से नहीं पहुंच पा रहे हैं। रेतघाट चौराहे के पास शैडो एरिया बनने के कारण वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान भोपाल पुलिस को रिपीटर लगाकर काम चलाना पड़ रहा है। कई बार सिग्मा (टीआई), ब्रेवो (एसआई), चार्ली (सिपाही) आपस में हेलो...हेलो ही करते रह जाते हैं।
ऐसे ही यदि कोई बड़ा लॉ एंड ऑर्डर हो तो भी इन सेट्स का सिग्नल जाम हो जा रहा है। बार-बार खराब हो रहे पुराने सेट्स को सुधरवाने की कवायद के बीच एक बार फिर नए डिजिटल ट्रंकिंग सिस्टम का टेंडर एक ही कंपनी के आने से अटक गया है। मप्र पुलिस की रेडियो शाखा करीब 30 करोड़ रुपए के नए ट्रंकिंग सिस्टम के लिए 6 बार टेंडर कर चुकी है। हर बार एक या दो कंपनियां ही इसमें शामिल हो पाई हैं। भोपाल जिले में वर्ष 2001 में एनालॉग रेडियो ट्रंकिंग सिस्टम लगाया गया था। इसके तहत भोपाल पुलिस को 1500 छोटे-बड़े वायरलेस सेट बांटे गए थे।
इनमें भोपाल ट्रैफिक पुलिस को करीब 175 सेट दिए गए हैं। वायरलेस सेट रखने की पात्रता रेंज आईजी से लेकर एएसआई स्तर तक के पुलिस अफसरों को है। इसके अलावा सभी डायल 100, चार्ली, बीट प्रभारी और ट्रैफिक स्टाफ को भी ये सेट आधिकारिक कम्यूनिकेशन के लिए दिए जाते हैं। पुलिस का ज्यादातर वार्तालाप वायरलेस सेट पर ही करने का प्रावधान रखा गया है। प्रदेशभर के वायरलेस सेट के लिए रेडियो टॉवर भदभदा रेडियो मुख्यालय पर लगाया गया है।
नए डिजिटल वायरलेस सेट में ये होगी खासियत
अब तो कंपनी ने भी खड़े किए हाथ
भोपाल पुलिस को मिले एनालॉग वायरलेस सेट मोटोरोला कंपनी के हैं। अब तक पुलिस कोई बड़ी तकनीकी खामी आने पर कंपनी के एक्सपर्ट टेक्नीशियन की मदद ले लेती थी। अब एंड ऑफ लाइफ का हवाला देकर कंपनी ने भी इन्हें सुधारने के लिए हाथ खड़े कर दिए हैं। इसलिए पुलिस वायरलेस शाखा के टेक्नीशियन ही बाहर से पार्ट्स खरीदकर इन्हें सुधारकर काम चलाते हैं।
जुगाड़ से चल रहे वायरलेस सेट
जूदा वायरलेस सेट की औसत उम्र 10 साल है। भोपाल में 23 साल बीतने के बाद भी पुराने को ही इस्तेमाल किया जा रहा है। कई सेट तो ऐसे हैं, जिन्हें जुगाड़ से चलाया जा रहा है। यानी सेट में लगी बैटरी के कनेक्टर प्वाइंट पर रांगा सोल्ड करके भी इन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है। पुराने सेट होने के कारण इनकी बैटरी भी खराब हो चुकी हैं, जो कई बार आधे घंटे में ही लो हो जाती हैं। इनके कारण कई शैडो एरिया डेवलप हो गए हैं, जहां सेट को फ्रीक्वेंसी मिलती ही नहीं है।
लाउड हैं, लेकिन क्लियर नहीं
पुलिस के वायरलेस सेट 5-5 कोडिंग पर चलते हैं। यानी यदि किसी अधिकारी ने वायरलेस सेट के बारे में सवाल किया तो मातहत जवाब देंगे सर 5-5. इसका अर्थ ये हुआ कि सेट की आवाज लाउड है, जिसे मातहत की ओर से 5 अंक दिए जा रहे हैं। ऐसे ही सेट की आवाज क्लियर है, जिसे मातहत की ओर से 5 अंक दिए जा रहे हैं। मौजूदा परिस्थिति में ये सेट बेहतर काम करते हैं, लेकिन बड़े लॉ एंड ऑर्डर या वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान जवाब दे जाते हैं।
यहां आती है परेशानी
गुफा मंदिर, लालघाटी चौराहा, रेतघाट चौराहा, नई जेल रोड, केरवा रोड और कलियासोत के जंगल में पुराने सेट अक्सर धोखा दे जाते हैं। यहां पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण नेटवर्क की परेशानी आती है।
जल्द करेंगे खरीदी
नए डिजीटल ट्रंकिंग सिस्टम के लिए टेंडर प्रोसेस जारी है। एक या दो कंपनियों के ही पार्टिसिपेट करने के कारण फिलहाल नए सिस्टम की खरीदी नहीं की जा पाई है। जल्द ही ये प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।
-आदर्श कटियार, एडीजी दूरसंचार शाखा