
प्रदेश में कहीं कांग्रेस के आंदोलन हों या बैठकें, अग्रिम पंक्ति में दिग्विजय सिंह को देखा जा सकता है। दिग्विजय सिंह को राजगढ़ लोकसभा क्षेत्र में करारी हार मिली, लेकिन वह अब भी प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं। यह तब है, जब लोकसभा चुनाव में उन्होंने राजगढ़ में अपना अंतिम चुनाव बताकर वोट मांगा था।
विधानसभा चुनाव, 2023 के बाद कमल नाथ के दलबदल की अटकलों ने कांग्रेस संगठन के भीतर उनकी विश्वसनीयता को प्रभावित कर दिया। इसके बाद लोकसभा चुनाव में पराजय झेलने के बाद से कमल नाथ का राजनीतिक भविष्य ही डगमगा गया। लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने बेटे नकुल नाथ को परिवार के गढ़ छिंदवाड़ा में जिताने के लिए पूरी ताकत झोंकी लेकिन अन्य प्रत्याशियों के क्षेत्र में प्रचार करने के बजाय विदेश चले गए।
कमल नाथ और दिग्विजय सिंह के राजनीतिक जीवन पर गौर किया जाए तो दिखाई देता है कि दिग्विजय हमेशा जमीनी राजनीति करते रहे हैं, जबकि कमल नाथ ने मात्र कुछ खास लोगों की सहायता से राजनीति की। जैसे मालवा अंचल की बात करें तो सज्जन सिंह वर्मा या बाला बच्चन जैसे नेताओं के जरिये कमल नाथ पकड़ बनाते थे।
कमल नाथ केवल छिंदवाड़ा तक सिमटे रहे और महाकौशल के भी वे सर्वमान्य नेता नहीं बन पाए। इसके विपरीत दिग्विजय सिंह राघौगढ़ के जुड़े होने के नाते मध्य भारत और ग्वालियर- चंबल में हमेशा कांग्रेस के बड़े नेता बने रहे।
दिग्विजय ने इंदौर में पढ़ाई की थी तो उसके नाते उन्होंने मालवा अंचल में अपने संबंधों को हमेशा जीवंत बनाए रखा। महाकौशल क्षेत्र के नेताओं से भी उनके संबंध नजदीकी रहे। राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा और उनके परिवार के चलते यहां बड़ी संख्या में उनके समर्थक हैं।
अर्जुन सिंह को राजनीतिक गुरु मानने के कारण दिग्विजय सिंह की विंध्य अंचल में भी अच्छी पकड़ थी। दोनों की राजनीति का यही बड़ा अंतर है-एक जमीनी नेता रहे तो दूसरे हवाई नेता।